सोरायसिस और पुरानी त्वचा समस्याएँ: मेरा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

सोरायसिस और पुरानी त्वचा समस्याएँ: मेरा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण"

सोरायसिस और पुरानी त्वचा समस्याएँ: मेरा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

डॉ. ममता चंदन

सोरायसिस केवल त्वचा की बीमारी नहीं है। यह एक लंबे समय तक रहने वाली सूजन संबंधी स्थिति है, जिसमें त्वचा पर लालिमा, खुजली, सूखापन, पपड़ी और मोटे चकत्ते दिखाई दे सकते हैं। इसका असर नींद, आत्मविश्वास, सामाजिक जीवन और मानसिक स्थिति पर भी पड़ सकता है। मेरे अनुभव में यही कारण है कि इसकी चिकित्सा केवल त्वचा पर लगाने वाली दवा तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

अपने 35 वर्षों के क्लिनिकल अनुभव में मैंने 100 से अधिक पुराने और जटिल त्वचा रोगों के मामलों का उपचार किया है। बार-बार एक बात स्पष्ट हुई है कि एक ही बीमारी के दो मरीजों को अलग-अलग उपचार की आवश्यकता हो सकती है।

इसलिए मैं सोरायसिस का इलाज केवल बीमारी का नाम देखकर नहीं करती। मैं मरीज की पूरी स्थिति को समझती हूँ, जैसे त्वचा का स्वरूप, बीमारी कब बढ़ती है, भोजन, पाचन, नींद, तनाव, पुरानी दवाएँ और जीवनशैली।

 

 

सोरायसिस दुनिया भर में पाया जाता है

सोरायसिस विश्व के लगभग सभी क्षेत्रों में पाया जाता है। अलग-अलग देशों और समुदायों में इसकी दर अलग हो सकती है। कुछ पश्चिमी देशों में यह 2 प्रतिशत से अधिक वयस्कों में पाया जाता है, जबकि एशिया के कुछ क्षेत्रों में इसकी दर कम बताई गई है।

भारतीय अध्ययनों में सोरायसिस की व्यापकता लगभग 0.44 प्रतिशत से 2.8 प्रतिशत तक बताई गई है, हालांकि भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में यह दर अलग हो सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की ICD-11 वर्गीकरण प्रणाली में सोरायसिस को EA90: Psoriasis के अंतर्गत रखा गया है। इसके मुख्य प्रकारों में प्लाक सोरायसिस, गट्टेट सोरायसिस, पस्टुलर सोरायसिस और एरिथ्रोडर्मिक सोरायसिस शामिल हैं।

 

आयुर्वेद में सोरायसिस को कैसे समझते हैं

आयुर्वेद में सोरायसिस की तुलना प्रायः एककुष्ठ से की जाती है। चरक संहिता में एककुष्ठ के कुछ लक्षणों का वर्णन किया गया है, जिनमें बड़े क्षेत्र में त्वचा प्रभावित होना और मछली के शल्क जैसी पपड़ी बनना शामिल है।

अस्वेदनं महावास्तु यन्मत्स्यशकलोपमम्।

चरक संहिता, चिकित्सा स्थान 7/21

यह वर्णन सोरायसिस के कुछ प्रमुख लक्षणों से मिलता-जुलता है, विशेषकर मोटी और बार-बार बनने वाली पपड़ी से। फिर भी हर मरीज को सीधे एककुष्ठ कहना उचित नहीं है। आयुर्वेद में कई प्रकार के पुराने त्वचा रोगों का वर्णन मिलता है और सही उपचार के लिए मरीज का पूरा परीक्षण आवश्यक है।

 

मैं केवल त्वचा को नहीं देखती

जब कोई मरीज सोरायसिस या किसी अन्य पुराने त्वचा रोग के साथ आता है, तो मैं केवल दाग, लालिमा या पपड़ी नहीं देखती।

मैं यह भी जानने का प्रयास करती हूँ कि:

पाचन कैसा है

भूख कैसी है

कब्ज या अन्य पेट की परेशानी है या नहीं

नींद ठीक है या नहीं

तनाव कितना है

कौन-सा भोजन करने से समस्या बढ़ती है

मौसम बदलने पर बीमारी बढ़ती है या नहीं

पहले कौन-कौन सी दवाएँ ली गई हैं

खुजली, जलन, रक्तस्राव या रिसाव है या नहीं

बीमारी कितने वर्षों से है

ये बातें यह समझने में मदद करती हैं कि बार-बार होने वाले flare-up के पीछे कौन से कारण काम कर रहे हैं।

 

हर मरीज का उपचार अलग होना चाहिए

किसी मरीज में मुख्य समस्या सूखापन और बहुत अधिक पपड़ी होती है। किसी में लालिमा और जलन अधिक होती है। कुछ मरीजों में मोटे चकत्ते और तेज खुजली प्रमुख होती है।

कई बार तनाव बीमारी को बढ़ाता है। कुछ मरीजों में गलत खानपान या कमजोर पाचन एक महत्वपूर्ण कारण होता है।

इसलिए मैं हर सोरायसिस मरीज को एक जैसी दवा देने में विश्वास नहीं करती। उपचार में भोजन में बदलाव, हर्बल दवाएँ, स्थानीय प्रयोग, चयनित मरीजों में पंचकर्म और नियमित फॉलो-अप शामिल हो सकते हैं।

 

चयनित मरीजों में शोधन

लंबे समय से चल रहे और कठिन मामलों में मैं कुछ मरीजों को शोधन चिकित्सा की सलाह देती हूँ।

यह हर मरीज के लिए आवश्यक नहीं है। मरीज की उम्र, ताकत, बीमारी की गंभीरता, अन्य रोगों और पहले लिए गए उपचार को देखकर ही तय किया जाता है कि पंचकर्म उचित है या नहीं। कुछ मामलों में तैयारी के बाद विरेचन, वमन या अन्य उचित प्रक्रिया की जा सकती है।

शोधन का उद्देश्य केवल तथाकथित "डिटॉक्स" करना नहीं है। इसका उद्देश्य शरीर को अगली उपचार प्रक्रिया के लिए तैयार करना है।

शोधन के बाद की चिकित्सा बहुत महत्वपूर्ण है

मेरे अनुभव में शोधन के बाद का उपचार अत्यंत महत्वपूर्ण है।

शोधन के बाद जब मरीज सामान्य आहार पर आ जाता है, तब मैं त्वचा की स्थिति का दोबारा आकलन करती हूँ। इसके बाद आंतरिक हर्बल दवाएँ, स्थानीय प्रयोग, भोजन में सुधार, पाचन पर काम, तनाव और नींद का संतुलन तथा नियमित फॉलो-अप किया जाता है।

 

चयनित मरीजों में जलौका ( Medicinal Leech) चिकित्सा

कुछ पुराने त्वचा रोगों में मैं शोधन के बाद जलौकावचारण, यानी medicinal leech therapy, भी करती हूँ।

यह विशेष रूप से उन मरीजों में विचार किया जाता है जिनमें लालिमा, सूजन या कुछ विशेष प्रकार के स्थानीय घाव अधिक होते हैं।

यह घर पर करने वाली चिकित्सा नहीं है।

मरीज का haemoglobin, bleeding tendency, चल रही दवाएँ और सामान्य स्वास्थ्य देखना आवश्यक होता है। सही hygiene, medicinal leeches का उचित उपयोग और बाद की देखभाल अनिवार्य है। यह उपचार उपयोगी हो सकता है, लेकिन हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है।

 

अपने मरीजों के लिए हर्बल दवाएँ स्वयं तैयार करती हूँ

मेरी क्लिनिकल प्रैक्टिस की एक विशेष बात यह है कि मैं अपने मरीजों के लिए हर्बल दवाओं का चयन और तैयारी स्वयं करती हूँ।

मेरा मानना है कि हर पुराने त्वचा रोगी को एक जैसी तैयार दवा नहीं दी जानी चाहिए।

मैं मरीज की त्वचा की स्थिति, लक्षण, पाचन, उम्र, ताकत और पहले के उपचार के परिणाम को देखकर जड़ी-बूटियों का चयन करती हूँ।

उदाहरण के लिए, बहुत अधिक सूखापन और पपड़ी वाले मरीज की दवा उस मरीज से अलग हो सकती है जिसमें तेज लालिमा और जलन अधिक है। यदि पाचन कमजोर है, तो पहले उसे सुधारना भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

मेरे लिए यह व्यक्तिगत दवा निर्माण केवल परंपरा नहीं, बल्कि क्लिनिकल आवश्यकता है।

 

भोजन भी उपचार का हिस्सा है

यदि रोज वही भोजन लिया जा रहा हो जो समस्या बढ़ा रहा है, तो केवल दवाओं से लंबे समय तक अच्छे परिणाम मिलना कठिन हो सकता है।

मैं सामान्यतः भोजन को सरल और आसानी से पचने योग्य रखने की सलाह देती हूँ। मरीज की स्थिति के अनुसार बहुत अधिक खट्टा, fermented, तीखा, processed और भारी भोजन कम करने की सलाह दी जा सकती है।

मैं हर मरीज को एक जैसा diet chart नहीं देती। भोजन मरीज, मौसम और बीमारी के स्वरूप के अनुसार तय होना चाहिए।

 

तनाव से त्वचा की समस्या बढ़ सकती है

यदि आप सोरायसिस, लंबे समय की खुजली, बार-बार होने वाली पपड़ी, eczema जैसे चकत्तों या किसी अन्य पुरानी त्वचा समस्या से परेशान हैं, तो लंबे समय तक स्वयं दवा लेते रहने से बचें।

कई त्वचा रोग देखने में एक जैसे लग सकते हैं। इसलिए सही निदान बहुत महत्वपूर्ण है।

बहुत से मरीज स्वयं बताते हैं कि तनाव के समय उनकी त्वचा की समस्या बढ़ जाती है।

खराब नींद, चिंता, अधिक काम और लगातार मानसिक तनाव flare-up बढ़ा सकते हैं।

नियमित नींद, हल्की सैर, योग, श्वास अभ्यास और मानसिक तनाव कम करने के सरल उपाय उपचार में सहायक हो सकते हैं।

 

भोजन भी उपचार का हिस्सा है

यदि रोज वही भोजन लिया जा रहा हो जो समस्या बढ़ा रहा है, तो केवल दवाओं से लंबे समय तक अच्छे परिणाम मिलना कठिन हो सकता है।

मैं सामान्यतः भोजन को सरल और आसानी से पचने योग्य रखने की सलाह देती हूँ। मरीज की स्थिति के अनुसार बहुत अधिक खट्टा, fermented, तीखा, processed और भारी भोजन कम करने की सलाह दी जा सकती है।

मैं हर मरीज को एक जैसा diet chart नहीं देती। भोजन मरीज, मौसम और बीमारी के स्वरूप के अनुसार तय होना चाहिए।

 

35 वर्षों के अनुभव से मैंने क्या सीखा

100 से अधिक पुराने त्वचा रोगों के मामलों का उपचार करने के बाद मेरा निष्कर्ष बहुत सरल है:

सोरायसिस के हर मरीज के लिए एक ही दवा नहीं हो सकती।

मेरा सामान्य दृष्टिकोण इस प्रकार रहता है:

सही निदान → बीमारी बढ़ाने वाले कारणों की पहचान → भोजन और पाचन में सुधार → जरूरत होने पर शोधन → चयनित मरीजों में जलौका चिकित्सा → मेरे द्वारा तैयार व्यक्तिगत हर्बल दवाएँ → स्थानीय देखभाल → नियमित फॉलो-अप

इसका उद्देश्य केवल त्वचा के चकत्ते कम करना नहीं है। उद्देश्य यह समझना भी है कि बीमारी बार-बार क्यों लौटती है और मरीज को लंबे समय तक बेहतर स्थिति में कैसे रखा जा सकता है।

 

मरीजों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश

यदि आप सोरायसिस, लंबे समय की खुजली, बार-बार होने वाली पपड़ी, eczema जैसे चकत्तों या किसी अन्य पुरानी त्वचा समस्या से परेशान हैं, तो लंबे समय तक स्वयं दवा लेते रहने से बचें।

कई त्वचा रोग देखने में एक जैसे लग सकते हैं। इसलिए सही निदान बहुत महत्वपूर्ण है।

आप अपनी पुरानी reports, prescriptions और treatment history के साथ परामर्श कर सकते हैं। हर मरीज का अलग-अलग मूल्यांकन करने के बाद ही यह तय किया जाता है कि हर्बल दवाएँ, पंचकर्म, जलौका चिकित्सा या अन्य आयुर्वेदिक उपचार में से क्या उपयुक्त रहेगा।

डॉ. ममता चंदन
आयुर्वेद चिकित्सक
मेरा उद्देश्य सरल है: केवल त्वचा के चकत्ते का नहीं, पूरे मरीज का उपचार करना।

 

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